2. 58 Hindi -2.58 | कछुए की तरह इंद्रियों को रोकना सीखो#BhagavadGita #श्लोक258 #SelfControl
[thoughtful] भगवद् Gita अध्याय 2, श्लोक 58 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ [2.58] [thoughtful] श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—जैसे कछुआ जरूरत पड़ने पर अपने हाथ-पैर और सिर को खोल के अंदर खींच लेता है, वैसे ही जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को बाहरी आकर्षणों से वापस खींच सकता है, उसकी बुद्धि स्थिर मानी जाती है। हमारी आँखें सुंदर चीजें देखना चाहती हैं, जीभ स्वाद चाहती है, कान तारीफ सुनना चाहते हैं और मन आराम, पैसा और सुख-सुविधाओं की तरफ खिंचता है। इनमें से कुछ भी अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन अगर हमारी खुशी पूरी तरह इन्हीं पर निर्भर हो जाए, तो हम उनके गुलाम बन जाते हैं। गौतम बुद्ध का जीवन इसका बहुत बड़ा उदाहरण है। राजकुमार सिद्धार्थ के पास महल, धन, परिवार और हर तरह की सुविधा थी। उनके पिता ने कोशिश की कि उन्हें जीवन का दुख दिखाई ही न दे। लेकिन जब सिद्धार्थ ने बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु देखी, तो उन्हें समझ आया कि महल की सुविधाएँ जीवन के इन सच्चे प्रश्नों का जवाब नहीं दे सकतीं। लगभग 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने राजसी जीवन छोड़ दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े। उन्होंने बाहरी सुखों से खुद को पीछे खींचा, क्योंकि वे उनसे भी बड़ी चीज—जीवन और दुख के वास्तविक अर्थ—को समझना चाहते थे। [emphatic] इंद्रियों पर नियंत्रण का मतलब सुख से नफरत करना नहीं है। इसका मतलब है—सुख सामने हो, फिर भी जरूरत पड़ने पर उससे पीछे हट सकना। यही सच्चा self-control है। #BhagavadGita #Gita #Gita2_58 #BhagavadGitaChapter2 #Sthitaprajna #SelfControl #IndriyaNiyantran Bimal Bangar
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