2. 56 HINDI 2.56 | दुख में न टूटे, सुख में न बहके#BhagavadGita #श्लोक2.56 #संतुलन
[thoughtful] भगवद् Gita अध्याय 2, श्लोक 56 दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ [2.56] [thoughtful] श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—जिस व्यक्ति का मन दुख आने पर पूरी तरह टूटता नहीं, सुख मिलने पर उसकी चाह में बहकता नहीं, और जो लगाव, डर और गुस्से को अपने फैसलों पर हावी नहीं होने देता—वही शांत और संतुलित बुद्धि वाला व्यक्ति है। इसका मतलब यह नहीं कि उसे दुख या खुशी महसूस ही नहीं होती। भावनाएँ सबके अंदर आती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वह अपनी भावनाओं का गुलाम नहीं बनता। दुख आया तो खुद को संभालता है, सफलता मिली तो arrogance में नहीं बहता, और कोई गलत करे तो गुस्से में अपना विवेक नहीं खोता। दलाई लामा का जीवन इसे बहुत अच्छी तरह समझाता है। 1959 में तिब्बत में हालात बहुत खराब हो गए। केवल 23 साल की उम्र में उन्हें अपना देश छोड़कर कठिन पहाड़ी रास्तों से भारत आना पड़ा। पीछे उनका घर, उनकी जमीन और हजारों तिब्बती लोग रह गए। बाद में उन्होंने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासन का जीवन शुरू किया। सोचिए—अपना देश छूट जाए, वापस जाने का रास्ता न हो और दशकों तक वही संघर्ष चलता रहे। ऐसी स्थिति में गुस्सा और बदले की भावना आना बहुत स्वाभाविक है। लेकिन दलाई लामा ने हिंसा और नफरत का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने लगातार शांति, करुणा, बातचीत और अहिंसा की बात की। 1989 में उन्हें Nobel Peace Prize भी मिला। [emphatic] शांत बुद्धि का मतलब भावनाएँ खत्म करना नहीं है। असली ताकत है—दुख में टूटना नहीं, सुख में बहकना नहीं और गुस्से में अपना विवेक नहीं खोना। #BhagavadGita #BhagavadGitaQuotes #Gita #GitaGyan #GitaUpdesh #BhagavadGita2_56 #Krishna #ShriKrishna #KrishnaVani #Sthitaprajna #Sthitapragya #InnerPeace Bimal Bangar
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