2. 55 Hindi-2.55 | जिसकी खुशी भीतर से आती है#BhagavadGita #श्लोक255 #आत्मसंतोष
[thoughtful] भगवद् Gita अध्याय 2, श्लोक 55 श्रीभगवानुवाच। प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ [2.55] [thoughtful] श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—जब इंसान मन में उठने वाली हर इच्छा के पीछे भागना छोड़ देता है और अपने भीतर ही संतोष महसूस करता है, तब उसे **शांत और संतुलित बुद्धि वाला व्यक्ति **कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि जीवन में कोई लक्ष्य या इच्छा ही न हो। समस्या इच्छा में नहीं, बल्कि उसके बिना खुश न रह पाने में है। अगर हमारी खुशी हमेशा पैसा, पद, तारीफ या किसी चीज के मिलने पर टिकी हो, तो मन कभी शांत नहीं रहेगा। नेल्सन मंडेला शांत और संतुलित बुद्धि वाले व्यक्ति का अच्छा उदाहरण हैं। उन्होंने 27 वर्ष जेल में बिताए, फिर भी बाहर आने के बाद बदला लेने के बजाय शांति और मेल-मिलाप का रास्ता चुना। इतने वर्षों के अन्याय के बाद भी उन्होंने अपने गुस्से को अपने फैसलों पर हावी नहीं होने दिया। वे जानते थे कि बदले की भावना देश को और बाँट देगी। इसलिए उन्होंने अपने व्यक्तिगत दर्द से ऊपर उठकर पूरे राष्ट्र के भविष्य के बारे में सोचा। यही स्थिर और संतुलित बुद्धि की पहचान है। [emphatic] जब हमारी खुशी बाहरी चीजों की गुलाम नहीं रहती, तब मन सच में स्वतंत्र और स्थिर हो जाता है। #BhagavadGita #Gita #BhagavadGita2 #GitaChapter2 #Shloka255 #Sthitaprajna #Krishna #Arjuna #KrishnaTeachings #GitaGyan #SpiritualWisdom #InnerPeace #SelfContentment #mentalpeace Bimal Bangar
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This Mahakavya presentation belongs to the Bhagavad Gita collection and is available in Hindi. Use the related stories below to continue through connected teachings and episodes.